शुक्रवार, 23 सितंबर 2011


आओ खरीदो, चुन लो
- अंचल ओझा

रूपयों की इस भीड़ में,
मेरी कीमत तुम सही आंको।
हजारों की अब पुछ नहीं कहीं,
मेरी कीमत लाखों-करोड़ों में आंको।


बेटी पैदा कर किया है तुमने पाप,
धन नहीं तो लिया सर क्यों यह शाप।
रूपयों की इस भीड़ में,
मेरी कीमत तुम सही आंको।
हजारों की अब पुछ नहीं कहीं,
मेरी कीमत लाखों-करोड़ों में आंको।

रिवाज के नाम पर दहेज मैं तुमसे लुंगा,
सात जन्मों का वचन मैं तुम्हें दूंगा।
रूपयों की इस भीड़ में,
मेरी कीमत तुम सही आंको।
हजारों की अब पुछ नहीं कहीं,
मेरी कीमत लाखों-करोड़ों में आंको।

पढ़ा-लिखा कर मां-बाप ने इस काबिल बना दिया,
दहेज एक दान था अभिशाप बना दिया।
भरी बाजार में सभी ने मेरा दाम लगा लिया,
आओ खरीदो, चुन लो, मैंने अपना बाजार सजा लिया।
रूपयों की इस भीड़ में,
मेरी कीमत तुम सही आंको।
हजारों की अब पुछ नहीं कहीं,
मेरी कीमत लाखों-करोड़ों में आंको।

सुन्दर-सुशील-सदाचारी कन्या चाहिए,
डांट-मार-उलाहना सहे जो ऐसी कन्या चाहिए,
दजेह की बलिवेदी पर चढ़े जो ऐसी कन्या चाहिए,
इन सब के बाद भी दहेज चौगुना चाहिए।
रूपयों की इस भीड़ में,
मेरी कीमत तुम सही आंको।
हजारों की अब पुछ नहीं कहीं,
मेरी कीमत लाखों-करोड़ों में आंको।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें